फ्रांस में साल के कैप्टन एल्फ़र्ड ड्रेफ़स के मुक़दमे का उदाहरण कोई वकील देना नहीं पसंद करता पाकिस्तान में कोई भी वकील साल के बाद ज़ुल्फ़िकर अली भुट्टो के मुक़दमे को अदालत में संदर्भ के रुप में पेश नहीं करता उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में कैप्टन ड्रेफ़स पर आरोप था कि उसने राष्ट्रीय रहस्य जर्मनों के दे किए बाद में पता चला कि यह काम वास्तव एक अन्य अधिकारी ने किया था जिसे बचाने के लिए सैन्य अदालत ने ड्रेफ़स को आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी थी पांच साल बाद जब सच सामने आया तो ड्रेफ़स को सम्मान के साथ सेना में उनके पद पर बहाल कर दिया गया इस प्रकार फ्रांसीसी सेना के एक दल की यहूदी विरोधी भावना को संतुष्ट करने की कोशिश को उदार फ्रांसीसी समाज ने खिड़की से बाहर फेंक दिया बीसवीं सदी के सातवें दशक में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को इस तथ्य के बावजूद मौत की सज़ा सुनाई गई कि भुट्टो अपराध में सीधे शामिल नहीं थे अदालत का फ़ैसला सर्वसम्मत नहीं बल्कि विभाजित था फिर भी उस समय की लोकतंत्र विरोधी सैन्य सरकार ने जनता की आत्मा की संतुष्टी के लिए भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया लेकिन आज तक इस फ़ैसले का फूली लाश पाकिस्तान की राष्ट्रीय अंतरात्मा पर बोझ बनी तैर रही है मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु को दिसंबर को भारतीय संसद पर हमले के दो दिन बाद हमले में सीधे शरीक ना होने के बावजूद पकड़ा गया था उनके साथ एसएआर गिलानी शौकत गुरू और उसकी पत्नी अफ़शां को भी हिरासत में लिया गया था पुलिस ने अफ़ज़ल के कब्जे से पैसे एक लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन भी खोज लिया लेकिन उन्हें सीलबंद करना भूल गई लैपटॉप में सिवाय गृह मंत्री के जाली अनुमति पत्र और संसद में प्रवेश के अवैध पासों के अलावा कुछ नहीं निकला शायद आरोपी ने सब कुछ डिलिट कर दिया था सिवाय सबसे महत्वपूर्ण सबूतों के जाने क्यों अफ़ज़ल को पूरे हिंदुस्तान से उसकी पसंद का एक वकील भी नहीं मिला सरकार की ओर से एक जूनियर वकील दिया गया उसने भी अपने मुवक्किल को कभी गंभीरता से नहीं लिया नागरिक की तरह जीवन गुज़ारने की गंभीर प्रयासों की कहानी पर ऊपर से नीचे तक किसी भी अदालत ने कान धरने की कोशिश नहीं की जिस मामले में न्याय के सभी आवश्यकताओं के पूरा होने के संदेह पर दो भारतीय राष्ट्रपतियों को अफ़जल गुरु की फांसी को रोक रखा अंततः तीसरे राष्ट्रपति ने अनुमति दे दी वह अदालतें भी समाज का सामूहिक अंतरात्मा ही संतुष्ट कर रही थीं रूस और पूर्वी यूरोप में पिछले बारह सौ साल में हर सौ डेढ़ सौ साल बाद यहूदी अल्पसंख्यकों के नस्ली सफाए की क्यों निंदा की जाए यह नेक काम भी बहुमत की सामूहिक अंतरात्मा को संतुष्ट करने के लिए ही हो रहा होगा संभव है कि गुजरात में जो कुछ हुआ इससे भी राज्य के सामाजिक बहुमत के लोगों का दिल ठंडा हुआ होगा तो फिर कानून की किताबें भी अलग रख दीजिए और हर मामले पर जनमत संग्रह कराएं बहुमत अगर कह दे कि फांसी दो तो फांसी दे दो सिर्फ इतने से काम के लिए गाऊन पहनने कठघरे बनवानेकानूनी की किताबें जमा करने और सुनवाई दर सुनवाई क्यों करना