दाँत के दो भाग होते हैं मसूड़े (दंतवेष्टि) के बाहर रहनेवाला भाग दंतशिखर कहलाता है और जबड़े के उलूखल में स्थित गर्त में संनिहित अंश को दंतमूल कहते हैं शिखर और मूल का संधिस्थल दंतग्रीवा है दाँत का मुख्य भाग दंतास्थित है दंतास्थि विशेष रूप से आरक्षित न रहे तो घिस जाय अतएव दंतशिखर में यह एनैमल नामक एक अत्यंत कड़े पदार्थ से ढकी रहती है दंतमूल में दंतास्थित का आवरण सीमेंट करती है सीमेंट और जबड़े की हड्डी को बीच दंतपर्यास्थित होती है जो दाँत को बाँधती भी है और गर्त में दाँत के लिये गद्दी का भी काम करती है दंतास्थि के अंदर दंतमज्जा होती है जो उस खोखले हिस्से में रहती है जिसे दंतमज्जागुहा कहते हैं इस गुहा में रुधिर और लसिकावाहिकाएँ तथा तंत्रिकाएँ होती हैं ये दंतमूल के छोर पर स्थित एक छोटे से छिद्र से दाँत में प्रवेश करती हैं दाँत एक जीवित वस्तु है अतएव इसे पोषण और चेतना की आवश्यकता होती है तंत्रिकाएँ दाँत को स्पर्शज्ञान प्रदान करती हैं एनैमल दाँत का सबसे कठोर और ठोस भाग है यह दंतशिखर को ढकता है चर्वणतल पर इसकी परत सबसे मोटी और ग्रीवा के निकट अपेक्षाकृत पतली होती है एनैमल की रचना षट्कोण प्रिज़्मों से होती है जो दंतास्थि से समकोण पर स्थित होते हैं एनैमल में चूने के फॉस्फेट कार्बोनेट मैग्नीशियम फास्फेट तथा अल्प मात्रा में कैलिसयम क्लोराइड होते हैं दंतास्थित में घना एकरूप आधारद्रव्य मेट्रिक्स और उसमें लहरदार तथा शाखाविन्याससंयुक्त दंतनलिकाएँ होती हैं ये नलिकाएँ एक दूसरे से समानांतर होती हैं और अंदर की ओर दंतमज्जागुहा में खुलती हैं इनके अंदर दंत तंतु के प्रवर्ध होते हैं दंतगुहा में जेली सी मज्जा भरी होती है इसमें ढीला संयोजक ऊतक होता है जिसमें रक्तवाहिका और तंत्रिकाएँ होती हैं गुहा की दीवार के पास डेंटीन कोशिकाओं की परत होती है और इन्हीं कोशों के तंतु दंतनलिका में फैले रहते हैं सीमेंट की रचना हड्डी सी होती है पर इसमें रुधिरवाहिकाएँ नहीं होतीं स्थायी दाँत चार प्रकार के होते हैं मुख में सामने की ओर या जबड़ों के मध्य मे छेदक दाँत होते हैं ये आठ होते हैं चार ऊपर चार नीचे इनके दंतशिखर खड़े होते हैं रुखानी के आकार सदृश ये दाँत ढालू धारवाले होते हैं इनका समतल किनारा काटने के लिये धारदार होता है इनकी ग्रीवा सँकरी तथा मूल लंबा एकाकी नुकीला अनुप्रस्थ में चिपटा और बगल में खाँचेदार होता है भेदक दाँत चार होते हैं छेदकों के चारों ओर एक एक ये छेदक से बड़े और तगड़े होते हैं इनका दंतमूल लंबा और उत्तल शिखर बड़ा शंकुरूप ओठ का पहलू उत्तल और जिह्वापक्ष कुछ खोखला और खुरदरा होता है इनका छोर सिमटकर कुंद दंताग्र में समाप्त होता है और यह दंतपंक्ति की समतल रेखा से आगे निकला होता है भेदक दंतमूल शंकुरूप एकाकी एवं खाँचेदार होता है अग्रचर्वणक आठ होते हैं और दो दो की संख्या में भेदकों के पीछे स्थित होते हैं ये भेदकों से छोटे होते हैं इनका शिखर आगे से पीछे की ओर सिमटा होता है शिखर के माथे पर एक खाँचे से विभक्त दो पिरामिडल गुलिकाएँ होती हैं इनमें ओठ की ओरवाली गुलिका बड़ी होती है दंतग्रीवा अंडाकार और दंतमूल एक होता है (सिवा ऊपर के प्रथम अग्रचर्वणक के जिसमें दो मूल होते हैं) चर्वणक स्थायी दाँतों में सबसे बड़े चौड़े शिखरयुक्त तथा चर्वण क्रिया के लिये विशेष रूप से समंजित होते हैं इनकी संख्या 12 होती है -- अग्रचर्वणकों के बाद सब ओर तीन तीन की संख्या में इनका शिखर घनाकृति का होता है इनकी भीतरी सतह उत्तल और बाहरी चिपटी होती है दंत के माथे पर चार या पाँच गुलिकाएँ होती हैं ग्रीवा स्पष्ट बड़ी और गोलाकार होती है प्रथम चर्वणक सबसे बड़ा और तृतीय (अकिलदाढ़) सबसे छोटा होता है ऊपर के जबड़े के चर्वणकों में तीन मूल होते हैं जिनमें दो गाल की ओर और तीसरा जिह्वा की ओर होता है तीसरे चर्वणक के सूत्र बहुधा आपस में समेकित होते हैं नीचे के चर्वणकों में दो मूल होते हैं एक आगे और एक पीछे अफ़्रीकी हाथी प्रजाति में दो या तीन (विवादित) जीवित जातियाँ हैं जबकि एशियाई हाथी प्रजाति के अंतर्गत केवल एशियाई हाथी ही जीवित जाति है लेकिन इसे तीन या चार (विवादित) उपजातियों में विभाजित किया जा सकता है अफ़्रीकी तथा एशियाई हाथी समान पूर्वज से क़रीब ७६ लाख वर्ष पूर्व विभाजित हो गये थे वे हाथी जो लॉक्सोडॉण्टा प्रजाति के अंतर्गत आते हैं और सामूहिक रूप से अफ़्रीकी हाथी कहलाते हैं वर्तमान में ३७ अफ़्रीकी देशों में पाया जाता है अफ़्रीकी हाथी एशियाई हाथी से कई प्रकार से भिन्न होते हैं जिनमें सबसे स्पष्ट उनके बड़े कान होते हैं अफ़्रीकी हाथी एशियाई हाथी से आकार में बड़े होते हैं और उनकी अवतल पीठ होती है अफ़्रीकी हाथी में नर और मादा दोनों के हाथीदांत होते हैं और उनकी त्वचा में बाल भी कम होते हैं अफ़्रीकी हाथी परंपरागत रूप से एक जाति के अंतर्गत दो उपजातियों में विभाजित किया गया है सवाना का हाथी या अफ़्रीकी बुश हाथी तथा अफ़्रीकी जंगली हाथी लेकिन हाल के डी एन ए परीक्षण बताते हैं कि वास्तव में यह दो अलग जातियाँ हो सकती हैं लेकिन सभी विशेषज्ञों द्वारा यह तर्क मान्य नहीं है अफ़्रीकी हाथी की एक तीसरी जाति भी प्रस्तावित की गई है जिसे पश्चिमी हाथी की संज्ञा दी गई है अफ़्रीकी बुश हाथी अफ़्रीकी जंगली हाथी एशियाई हाथी विलुप्त अमरीकी मॅस्टोडॉन तथा मैमथ के डी एन ए विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों सन् २०१० ई में इस निष्कर्ष में पहुँचे कि यकीनन अफ़्रीकी बुश हाथी तथा अफ़्रीकी जंगली हाथी दो अलग जातियाँ हैं इस पुनःवर्गीकरण का संरक्षण की दृष्टि से बहुत महत्व है अभी तक हाथियों को एक ही जाति का मानकर पूरी आबादी का एक साथ ही आंकलन किया जाता था लेकिन पुनःवर्गीकरण के बाद किसी जाति विशेष के हाथी की आबादी आंककर यह पता लगाने में सुविधा हो जायेगी कि किस जाति के हाथी को संरक्षण अधिक आवश्यकता है क्योंकि जिस हाथी की आबादी संकटग्रस्त की परिभाषा की परिधि में आती है उसके संरक्षण के लिए क़ानून और सख़्त करने पड़ेंगे और अवैध शिकारियों और तस्करों को संकटग्रस्त उस जाति के जानवरों या उनके शरीर के अंगों के व्यापार में रोक लगेगी अफ़्रीकी जंगली हाथी तथा अफ़्रीकी बुश हाथी परस्पर प्रजनन कर सकते हैं हालांकि जंगल में उनके पृथक् परिवेषों को अपनाये जाने के कारण ऐसे मौके कम ही मिलते हैं किन्तु बन्दी अवस्था में यह बात लागू नहीं होती है क्योंकि अफ़्रीकी हाथी को हाल ही में दो अलग जातियों का दर्जा मिला है ऐसा संभव है कि बन्दी हालत के अफ़्रीकी हाथी संकर हों दो नई प्रजातियों के वर्गीकरण के अंतर्गत लॉक्सोडॉण्टा ऍफ़्रिकाना केवल अफ़्रीकी बुश हाथी या सवाना हाथी को इंगित करता है जो भू-प्राणियों में सबसे विशाल है नर कंधे तक ३.२ मी. से ४ मी. तक का होता है और वज़न में ३५०० कि. से (सूचित) १२००० कि. तक का हो सकता है मादा थोड़ी छोटी होती है और कंधे तक क़रीब ३ मी. तक ऊँची होती है अमूमन सवाना हाथी घास के खुले मैदानों दलदल और झील के किनारे पाये जाते हैं यह सवाना के पूरे क्षेत्र में पाया जाता है जो कि सहारा के दक्षिण में है दूसरी तथाकथित जाति अफ़्रीकी जंगली (जंगल का) हाथी लॉक्सोडॉण्टा साइक्लॉटिस सवाना हाथी से आमतौर पर छोटा और गठीला होता है तथा उसके हाथीदांत पतले और कम घुमावदार होते हैं जंगल के हाथी का वज़न ४५०० कि. तक और कंधे तक की ऊँचाई क़रीब ३ मी. हो सकते हैं अपने सवाना संबन्धियों की तुलना में इनके बारे में बहुत कम जानकारी है क्योंकि पर्यावरण और राजनीतिक कारणों से इसमें बाधा आती है प्रायः यह मध्य और पश्चिमी अफ़्रीका के घने वर्षावनों में रहते हैं लेकिन कभी-कभी वनों की सीमाओं में भी विचरण करते हैं जिससे उनका आवासीय क्षेत्र सवाना हाथी के क्षेत्र से मिल जाता है जिससे संकरण हो सकता है सन् १९७९ ई. में यह अनुमान लगाया गया कि अफ़्रीकी हाथियों की आबादी १३ लाख की है यह अनुमान विवादास्पद है और यह मानना है कि यह अध्यागणन है लेकिन इसी तथ्य का व्यापक रूप से उल्लेख किया जाता है और अब यह वसुसतुतः आंकलन का आधार बन गया है जिसको ग़लत ढंग से दिखलाकर जाति का निरंतर पतन परिमाणित किया जाता है सन् १९८० के दशक में अज्फ़्रीकी हाथियों कोअथी ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया क्योंकि अवैध शिकार के कारण पूर्वी अफ़्रीका में इनकी आबादी निरंतर घटती चली गई आइ यू सी एन की सन् २००७ ई. की रिपोर्ट के मुताबिक जंगली परिवेष में लगभग ४७०००० से ६९०००० के बीच में अफ़्रीकी हाथी हैं हालांकि यह आंकड़ा भी हाथियों के कुल आवासीय क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा ही समाविष्ट करता है विशेषज्ञ यह मानते हैं कि असली आंकड़ा इससे अधिक नहीं होगा क्योंकि इसकी संभावना कम है कि इसके अलावा हाथियों की कोई बड़ी आबादी खोजी जायेगी आजकल इनकी सबसे ज़्यादा आबादी दक्षिण तथा पूर्वी अफ़्रीका में पाई जाती है जो कुल मिलाकर महाद्वीप की अधिकांश आबादी है आइ यू सी एन के विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण तथा पूर्वी अफ़्रीका की बड़ी आबादी स्थिर है और १९९० के दशक के मध्य से प्रति वर्ष औसतन ४.५% की दर से बढ़ती भी जा रही है दूसरी तरफ़ पश्चिमी अफ़्रीका में हाथी की आबादी छोटी तथा बंटी हुयी है और महाद्वीप के बहुत छोटे अनुपात को दर्शाती है मध्य अफ़्रीका की आबादी के बारे में बहुत अनिश्चित्ता बनी हुयी है जहाँ जंगलों के कारण आबादी का सर्वेक्षण करना कठिन कार्य है परन्तु यह ज्ञात है कि वहाँ हाथीदांत के अवैध शिकार तथा हाथी के मांस के लिए उनका धड़ल्ले से शिकार किया जा रहा है दक्षिण अफ़्रीका में हाथी की आबादी दुगुने से ज़्यादा हो गयी है और यह संख्या सन् १९९५ में हाथीदांत के व्यापार में पाबन्दी लगाने के बाद ८००० से बढ़कर २०००० से अधिक हो गई है दक्षिण अफ़्रीका (अन्य जगह नहीं) में यह पाबन्दी फरवरी २००८ को हटा दी गई जो पर्यावरण गुटों में विवाद का विषय बन गया है एशियाई हाथी ऍलिफ़स मैक्सिमस अफ़्रीकी हाथी से छोटा होता है इसके कान छोटे होते हैं और अधिकांश रूप से केवल नर में हाथीदांत पाये जाते हैं दुनिया भर में एशियाई हाथी की - जिनहें भारतीय हाथी भी कहा जाता है - आबादी ६०००० आंकी गई है जो अफ़्रीकी हाथी का दसवां भाग है अधिक सटीक यह अनुमान लगाया गया है कि एशिया में जंगली हाथी क़रीब ३८००० से ५३००० हैं तथा पालतू हाथी १४५०० से लेकर १५३०० हैं और तक़रीबन १००० हाथी दुनिया भर के चिड़ियाघरों में हैं एशियाई हाथी की आबादी का पतन अफ़्रीकी हाथी की तुलना में धीरे हुआ है और इसके प्रमुख कारण हैं अवैध शिकार तथा मनुष्यों द्वारा उनके क्षेत्रों को हड़प जाना जयपुर भारत में एक सुसज्जित हाथी श्री लंका में हाथियों का अनाथाश्रम एशियाई हाथी की कई उपजातियाँ मौर्फ़ोमीट्रिक तथा मौलिक्यूलर डाटा प्रणालियों द्वारा पहचानी गई हैं ऍलिफ़स मैक्सिमस मैक्सिमस (श्री लंकाई हाथी) केवल श्री लंका के द्वीप में पाया जाता है वह एशियाई हाथियों में सबसे बड़ा है एक अनुमान के मुताबिक इनकी जंगलों में संख्या ३००० से ४५०० तक आंकी गई है हालांकि हाल में कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है बड़े नर हाथी ५४०० कि. के लगभग वज़नी होते हैं तथा कंधे तक ३.४ मी. तक ऊँचे होते हैं नरों के माथे पर बहुत बड़े उभार होते हैं और दोनों लिंगों में अन्य एशियाई हाथियों की तुलना में रंजकता क्षीण होती है विशेषतयः इनके सूंड़ कान मुँह तथा पेट में हल्के ग़ुलाबी रंग के चित्ते पड़े होते हैं पिन्नावाला श्री लंका में हाथियों का अनाथाश्रम है जो इनको विलुप्त होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है एशियाई हाथी की आबादी का बड़ा हिस्सा बनाता है क़रीब ३६००० की आबादी वाले ये हाथी हल्के स्लेटी रंग के होते हैं तथा इनके केवल कानों और सूंड में रंजकता क्षीण होती है बड़े नर अमूमन ५००० कि. वज़नी होते हैं लेकिन श्री लंकाई हाथी जितने ऊँचे होते हैं मुख्य भू-भागीय हाथी भारत से लेकर इंडोनेशिया तक ११ एशियाई देशों में पाया जाता है इनको जंगली इलाके परिवर्ती अंचल जो कि जंगलों और घास के मैदानों के बीच होते हैं पसन्द हैं क्योंकि वहाँ इनको भोजन में अधिक विविधता मिल जाती है ऍलिफ़स मैक्सिमस सुमात्रेनस या सुमात्रा का हाथी केवल सुमात्रा ही में पाया जाता है यह भारतीय हाथी से छोटा होता है इनकी संख्या २१०० से ३००० के बीच आंकी गई है यह भारतीय हाथी से भी हल्के रंग का होता है और इसकी रंजकता अन्य एशियाई हाथियों की तुलना में कम क्षीण होती है तथा सिर्फ़ कानों पर ग़ुलाबी धब्बे होते हैं वयस्क सुमात्राई हाथी अमूमन कंधे तक केवल १.७ से २.६ मी. ऊँचा होता है तथा वज़न में ३००० कि. से कम होता है यह अपने एशियाई तथा अफ़्रीकी रिशतेदारों से काफ़ी छोटा होता है और केवल सुमात्रा द्वीप के उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ या तो जंगल हों या पेड़ों की झुरमुट हो जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में नर हाथी सन् २००३ ई. में बोर्नियो द्वीप में एक अन्य उपजाति पहचानी गई है इसको बोर्नियो पिग्मी हाथी के नाम से नवाज़ा गया है और अन्य एशियाई हाथियों की तुलना में यह ज़्यादा छोटा और कम आक्रामक होता है इसके अपेक्षाकृत बड़े कान और पूँछ होते हैं और इसके हाथीदांत भी अधिक सीधे होते हैं हाथी अपनी सूंड या तो चेतावनी देने के लिए या फिर मित्र अथवा शत्रु सूंघने के लिए उठाता है हाथी अपनी सूंड का इस्तेमाल कई कार्यों के लिए करता है सूंड हाथी की नाक और उसके ऊपरी होंठ की संधि है और लंबी हो जाने के कारण यह हाथी का सबसे महत्वपूर्ण तथा कार्यकुशल अंग बन गया है अफ़्रीकी हाथियों की सूंड के छोर में दो अंगुलिनुमा उभार होते हैं जबकि एशियाई हाथियों में केवल एक ही उभार होता है एक तरफ़ तो हाथी की सूंड इतनी संवेदनशील होती है कि घास का एक तिनका भी उठा लेती है तो दूसरी तरफ़ इतनी मज़बूत भी होती है कि पेड़ की टहनियाँ भी उखाड़ ले अधिकांश शाकाहारी पशुओं के दाँतों की संरचना इस प्रकार की होती है कि वह पौधे के विभिन्न भागों को काट-फाड़ सकें जबकि हाथियों में बीमार और बहुत छोटे बच्चों के अलावा हाथी पहले अपनी सूंड से खाना फाड़ता है और फिर उस निवाले को अपने मुँह में पहुँचाता है वह सूंड के द्वारा घास चरता है या फिर ऊपर पेड़ से पत्तियाँ फल या समूची शाखायें तोड़ लेता है अगर पेड़ में भोजन उसकी सूंड की पहुँच से भी परे है तो हाथी अपनी सूंड पेड़ के तने या शाखा में लपेटकर ज़ोर से झिंझोड़ता है ताकि फल इत्यादि नीचे टपक जाये या कभी-कभी पूरे का पूरा पेड़ ही उखाड़ देता है हाथी सूंड का इस्तेमाल पानी पीने के लिए भी करता है नहाने के लिए भी हाथी इसी विधि का इस्तेमाल करता है नहाने के बाद अपने गीले शरीर में हाथी सूंड से मिट्टी छिड़क लेता है जो सूखकर उसकी त्वचा के ऊपर पपड़ी का रूप ले लेती है और उसकी तेज़ धूप तथा परजीवियों से सुरक्षा करती है अन्य स्तनपाइयों की तरह — सिवाय इन्सान और वनमानुष के जिन्हे सीखना पड़ता है — हाथी भी बहुत अच्छा तैराक होता है तैरते समय हाथी अपनी सूंड का इस्तेमाल स्नॉरकॅल की तरह करता है सूंड हाथी के सामाजिक कार्यकलापों के ऊपर भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है संबन्धी अपनी सूंडें एक दूसरे से लपेटकर अभिवादन करेंगे जैसा मनुष्य हाथ मिलाकर करते हैं इसका इस्तेमाल वह खेल करते हुए कुश्ती में मिलन से पहले माँ तथा बच्चे के सम्बन्ध में तथा अन्य कार्यकलापों में भी करते हैं उठी हुयी सूंड चेतावनी या धमकी हो सकती है जबकि सिर नीचे करके झुकी हुयी सूंड समर्पण का संकेत हो सकती है दुश्मन को हाथी अपनी सूंड से लपेटकर फेंक सकता है हाथी की सूंड में मनुष्य से कई गुणा अधिक घ्राण शक्ति होती है और वह अपनी सूंड ऊपर उठाकर तथा दाहिने बायें समुद्री दूरबीन (पॅरिस्कोप) की तरह लहराकर अपने खाद्य स्रोत मित्र तथा शत्रु का पता लगा लेता है हाथी के हाथीदाँत उसके दूसरी ऊपरी छेदक दाँत होते हैं हाथीदाँत हाथी के जीवनकाल में निरन्तर बढ़ते रहते हैं एक वयस्क नर के हाथीदाँत लगभग एक वर्ष में १८ से. मी. की दर से बढ़ते रहते हैं हाथीदाँत पानी लवण तथा मूल खोदने के काम आते हैं इसके अलावा पेड़ों की छाल छीलने और अपने लिए रास्ता तैयार करने में भी हाथीदाँत का बड़ा योगदान होता है इसके अलावा हाथीदाँत अपनी परिधि जताने के लिए पेड़ों में निशानदेही के लिए तथा कभी कभार अस्त्र-शस्त्र के लिए भी इस्तेमाल में लाए जाते हैं जैसे मनुष्य दायाँ या बायाँ हाथ का इस्तेमाल करने वाला होता है उसी प्रकार हाथी भी आमतौर पर दायाँ या बायाँ हाथीदाँत इस्तेमाल करता है मुख्य हाथीदाँत अमूमन थोड़ा छोटा होता है और उसके छोर कुछ गोल होते हैं क्योंकि उस हाथीदाँत का ज़्यादा इस्तेमाल हुआ होता है नर और मादा अफ़्रीकी हाथी के लम्बे हाथीदाँत होते हैं जो वयस्क अवस्था में ३ मी. तक लम्बे और ९० कि. तक वज़नी हो सकते हैं एशियाई हाथियों में सिर्फ़ नर के लम्बे हाथीदाँत होते हैं मादा के बहुत छोटे या अमूमन नहीं होते हैं एशियाई नर के अफ़्रीकी नर जितने लम्बे हाथीदाँत हो सकते हैं लेकिन वह बहुत पतले और हल्के होते हैं आज तक सबसे वज़नी ३९ कि. का आंका गया है हाथीदाँत में नक्काशी सरलतापूर्वक हो जाती है अतः कलाकारों ने इसे महत्ता दी जिसके कारण भारी सङ्ख्या में विश्व में हाथियों का विनाश हुआ अन्य स्तनपाइयों के विपरीत जिनके दूध के दाँत झड़ने के बाद स्थाई दाँत आ जाते हैं हाथी के दाँत निरन्तर बदली होते रहते हैं लगभग एक वर्ष की आयु में हाथीदाँत के अग्रगामी दूध के दाँत झड़ जाते हैं और हाथीदाँत उगने लग जाते हैं किन्तु चबाने वाले दाँत (अग्रचर्वणक तथा चर्वणक) एक हाथी की आयु में क़रीब पांच बार या बहुत विरले ही छः बारबदली होते हैं एक बार में केवल चार चबाने वाले दाँत (अग्रचर्वणक तथा/अथवा चर्वणक) एक-एक दोनों जबड़ों के दोनों तरफ़ प्रयोग में लाये जाते हैं या केवल दो क्योंकि जबड़े के हर हिस्से में दूसरा दाँत पहले को बदली कर रहा होता है मानव दाँतों के विपरीत पक्के दाँत दूध के दाँतों को ऊपर की तरफ़ से नहीं धकेलते हैं वरन् नये दाँत मुख के पिछले भाग में उगते हैं तथा पुराने दाँतों को आगे की तरफ़ धकेलते हैं जहाँ पुराने दाँत टूट-टूट कर गिर जाते हैं अफ़्रीकी हाथियों में जन्म से ही चबाने वाले दाँतों का पहला समूह (सॅट) (अग्रचर्वणक) मौजूद होता है जब शावक दो वर्ष का होता है तो दोनों जबड़ों के दोनों तरफ़ का पहला चबाने वाला दाँत गिर जाता है यही प्रक्रिया दूसरे चबाने वाले दाँतों के समूह के साथ छः वर्ष की आयु में होती है १३ से १५ वर्ष की आयु तक तीसरा दाँतों का समूह भी जाता रहता है तथा चौथा समूह २८ वर्ष की आयु में झड़ जाता है पाँचवा समूह हाथी की ४० वर्ष की आयु तक चलता है कदाचित छठा समूह हाथी के जीवन के अन्त तक चलता है यदि हाथी ६० वर्ष की आयु से अधिक जीवित रह जाता है तो चर्वणक का आख़िरी समूह भी घिस-घिस कर ठूंठ भर रह जाता है तथा हाथी भली भांति खा भी नहीं सकता है हाथियों को बोलचाल की भाषा में हाथी (अपने मूल वैज्ञानिक वर्गीकरण से) कहा जाता है जिसका अर्थ मोटी चमड़ी के जानवरों से है इसके शरीर का अधिकांश भाग अत्यंत कठोर होता है हालांकि मुंह और कान के भीतर के चारों ओर त्वचा काफ़ी पतली होती है आम तौर पर एक एशियाई हाथी की त्वचा में अपने अफ्रीकी रिश्तेदार से अधिक बाल होते हैं युवा हाथी में यह फ़र्क अधिक नज़र आता है एशियाई शावकों की त्वचा अमूमन कत्थई रंग के बालों से ढकी रहती है उम्र के साथ बाल गाढ़े रंग के होने के साथ-साथ कम होने लगते हैं लेकिन उसके सिर और पूँछ में वह सदा रहते हैं हाथी यों तो स्लेटी रंग के होते हैं लेकिन अफ़्रीकी हाथी अलग-अलग रंग की मिट्टी में लोटकर लाल या भूरे रंग के प्रतीत होते हैं गीली मिट्टी में लोटना हाथी समाज की दिनचर्या का एक अभिन्न अंग होता है न केवल लोटना सामाजिकरण के लिए अहम है बल्कि मिट्टी धूपरोधक का काम भी करती है और उसकी त्वचा को पराबैंगनी किरणों से बचाती है हाथी की त्वचा कठोर होने के बावजूद संवेदनशील होती है यदि वह नियमित रूप से मिट्टी का स्नान न करे तो उसकी त्वचा को जलने से कीटदंश से और नमी निकल जाने से काफ़ी नुक़सान हो सकता है मिट्टी में लोटने से त्वचा को हाथी के शरीर का तापमान नियंत्रित करने में मदद मिलती है हाथी को अपनी त्वचा से शरीर की गर्मी निकालने में मुश्किल होती है क्योंकि शरीर के अनुपात में त्वचा बहुत कम होती है हाथी के वज़न और उसकी त्वचा के सतही क्षेत्रफल का अनुपात मनुष्य की तुलना में बहुत अधिक होता है हाथियों को अपनी टांग उठाकर पैर के तालुओं को हवा देकर संभवतः ठण्डा रखने की कोशिश करते देखा गया है हाथी के पैरों कि बनावट मोटे स्तंभों या खंभों के समान होती है हाथी को अपनी सीधी टांगों और बड़े गद्देदार पैरों की वजह से खड़े रहने में मांसपेशियों से कम शक्ति की आवश्यकता होती है इसी कारण हाथी बिना थके बहुत लंबे समय तक खड़े रह सकते हैं वास्तव में अफ़्रीकी हाथियों को शायद ही कभी लेटे हुए देखा जाता हो सामान्यत: वे बीमार या घायल होने पर ही लेटते है इसके विपरीत एशियाई हाथी अक्सर लेटना पसन्द करते हैं हाथी के पैर लगभग गोल होते हैं अफ़्रीकी हाथियों के प्रत्येक पिछले पैर पर तीन नाखून और प्रत्येक सामने के पैर पर चार नाखून होते हैं भारतीय हाथियों के प्रत्येक पिछले पैर पर चार नाखून और प्रत्येक सामने के पैर पर पांच नाखून होते हैं पैर की हड्डियों के नीचे एक कड़ा श्लेषी पदार्थ होता है जो एक गद्दे या शॉकर के रूप में कार्य करता है हाथी के वज़न से पैर फूल जाता है लेकिन वज़न हट जाने से यह पहले जैसा हो जाता है इसी कारण से गीली मिट्टी में गहरा धँस जाने के बावजूद हाथी अपनी टांगों को आसानी से बाहर खींच लेता है शंका से आपका आध्यात्मिक विकास धीमा नहीं होता बल्कि इससे तेजी ही आती है सच्चे शंकालु व्यक्ति ही सच्चे आध्यात्मिक बनते हैं क्योंकि वे किसी बात पर आंख बंद कर विश्वास नही कर लेते बात की तह में जाने की कोशिश करते हैं शंका करना कोई बुरी बात नहीं है आपको समझना होगा कि शंका का अर्थ क्या है शंकालु होने का मतलब किसी चीज़ के बारे में पक्की जानकारी न होने की वजह से उस पर विश्वास नहीं करना पर यह अविश्वास जब हर चीज़ के बारे में हमेशा बने रहने वाले शक में बदल जाता है तो वह एक रोग बन जाता है अविश्वास का मतलब है कि आप पहले ही किसी नतीजे पर पहुंच चुके हैं लेकिन शंकालु होने का मतलब है कि आप अभी भी खोज-बीन कर रहे हैं आप अभी भी परतें खोल कर उनको अच्छी तरह देखना चाहते हैं तो शंका से आपका आध्यात्मिक विकास धीमा नहीं होता इससे इसमें तेजी ही आती है सच कहें तो केवल सच्चे शंकालु लोग ही आध्यात्मिक बन पाते हैं क्योंकि वे कुछ खोज रहे होते हैं बाकी लोग तो हर चीज़ के लिए पहले ही बेवकूफी-भरे नतीजों पर पहुंच चुके हैं- अविश्वासी लोग नकारात्मक नतीजों पर और विश्वासी सकारात्मक नतीजों पर लेकिन दोनों एक जैसे ही हैं थोड़ा इधर या थोड़ा उधर क्या फर्क पड़ता है वे सब एक ही खेल खेल रहे हैं आंकड़ों का खेल जब आप मौत के सामने खड़े होंगे तो सारे नतीजे धरे-के-धरे रह जायेंगे मुझे मालूम है कि लोग इस ज़िंदगी को मौत के पार तक खींचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन तब वे कुछ नही कर पाएंगे जब सामने मौत खड़ी होगी शंकालु इंसान जोड़ने-घटाने को तैयार नहीं होता जो जैसा है वह उसे वैसा ही देखना चाहता है यह एक आध्यात्मिक तरिका है आध्यात्मिक तरिका का मतलब है ज़िंदगी को ठीक उसी रूप में देखना जैसी कि वह है उसमें कुछ जोड़ना-घटाना नहीं है उसको उसके असली रूप में देखना है एक शंकालु आदमी की सोच ठीक ऐसी ही होती है मेरे विचार से आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए यह एक आदर्श सोच है कि किसी चीज़ को बढ़ा-चढ़ा कर या फिर कम कर के देखने की ज़रूरत नहीं लेकिन हर चीज़ को ले कर आपकी अपनी शंकाएं हैं अगर आप शंका नहीं करेंगे तो जांच-पड़ताल नहीं करेंगे जांच-पड़ताल या खोज-बीन साधना के लिए रूखा-सा शब्द हैं पर साधक एक प्रकार से खोजी ही होता है बात बस इतनी है कि एक सच्चा खोजी सच जानने के लिए साधना करता है अगर आप कहते हैं कि किसी की जांच हो रही है या आप किसी की जांच कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप किसी मामले का सच जानने की कोशिश कर रहे हैं इसको जांच-पड़ताल कहते हैं और यही साधना भी है आध्यात्मिक साधना भी एक जांच-पड़ताल है किसी एक इंसान की नहीं बल्कि अस्तित्व की हम पूरे अस्तित्व की जांच-पड़ताल कर रहे हैं यही है आध्यात्मिक साधना यदि आप शंकालु नहीं हैं तो कभी जांच-पड़ताल नहीं कर पायेंगे आप सीधे नतीजे पर पहुंच जायेंगे जब आप मौत के सामने खड़े होंगे तो सारे नतीजे धरे-के-धरे रह जायेंगे मुझे मालूम है कि लोग इस ज़िंदगी को मौत के पार तक खींचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन तब वे कुछ नही कर पाएंगे जब सामने मौत खड़ी होगी जब आपको ये समझ आ जाएगा कि आपके अस्तित्व की प्रकृति ही है एक दिन मिट जाना तो आपकी ज़िंदगी के सारे नतीजे गायब हो जायेंगे और तब आप ज़िंदगी की जांच-पड़ताल या कहें कि सत्य की साधना में जुट जायेंगे दोनों एक ही बात है बस इतना ही खयाल रखना होगा कि शंका के रास्ते कहीं आप निराशा की तरफ ना बढ़ जाएं अपनी ज़िंदगी से किनारा न कर लें यदि आप एक हताश-निराश शंकालु किस्म के इंसान हैं तो किसी दिमागी डॉक्टर की जरुरत है आपको अगर आपके मन में खुशी और शंका दोनों साथ हैं तो फिर आप एक बहुत अच्छे आध्यात्मिक साधक हैं और सत्य की साधना के लिए यह एक आदर्श मानसिक दशा है देव आप सारी प्रजा का नियमन करने वाले हैं अतः आपका यम नाम पड़ा हे श्रेष्ठ! मैंने यह भी सुना है कि मन वचन और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी का प्रतिद्रोह न कर के सब पर समान रूप से दया करना और दान देना ही महापुरुषों का सनातन धर्म है यूँ तो संसार के सभी पुरुष यथाशक्ति कोमलता का आश्रय ग्रहण करते हैं किन्तु महापुरुष तो महापुरुष होता है वह तो अपने पास आये शत्रु पर भी दया करता है कल्याणी! जैसे क्षुधित को अन्न मिले त्रिषित को जल मिले और चिर रोगी को अमृत समान औषधि मिल जाय वैसे ही तुम्हारे धर्मानुकूल वचनों को सुनकर मुझे खुशी-खुशी सत्यवान के जीवन को छोड़कर कोई तीसरा जो भी वर माँगो स्वीकार है देव! आप धर्मराज हैं आप दाता हैं और मैं दया की पात्रा हूँ मेरे पिता अश्वपति को कोई पुत्र नहीं है उन्हें भी औरस पुत्र देने की कृपा करें मुझे बरबस कोई तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाने को प्रेरित कर रहा हूँ चलो! यह भी दे दिया हे नारी रत्न! मेरी बात मान लो बहुत दूर आ गयी हो आगे का मार्ग किसी मानव के लिए असम्भव है अब तो लौट जा मेरी एक-दो बातें और सुन लीजिए एक तो मैं पति के समीप हूँ अतः दूरी का तो कोई नाम ही नहीं और न मुझे उसका अनुभव हो रहा है दूसरी बात आप विवस्वान सूर्य के पुत्र हैं और वैवष्वत्‌ कहलाते हैं सब पर समान न्याय करने वाले होते हैं आप तो सज्जन शिरोमणि हैं आप कृपा के जलधर हैं करुणा के सागर हैं और क्या इसमें भी दो राय है कि संतों के साथ सात कदम चल ही दिया जाय तो मित्रता हो जाती है- "सतां हि सप्तपदेशु मैत्री" अतः आप मेरे परम सुहृद भी हुए आप सन्त हैं कृपालु हैं सुहृद हैं न्यायी हैं धर्मराज हैं इसलिए आप पर विश्वास करके आप से कुछ कहने का साहस करती हूँ देवि! यह मेरी तीसरी पराजय है एक बारा हारा था ऋषि पुत्र मारकण्डेय से और उसे अमरत्व का वरदान मिला दूसरी बार हारा ऋषि-पुत्र नचिकेता से वह मेरी यमपुरी से अमरत्व का ज्ञान लेकर चिरंजीवी हो लौटा और तीसरी बार हारा नारी सावित्री से मेरे पास से तुमने अपने पति को प्रेम से छीन लिया है मैं हारा हूँ लेकिन प्रसन्नता से खेद से नहीं नियम में बँधा हुआ आज नियम तोड़ दे रहा है वचनबद्ध यमराज तुम्हें तुम्हारा पति दे रहा है जा! सावित्री नाम को पतिव्रता की रेखा में सबसे ऊँची कर दे आज की तिथि से तुम्हारे पति को चार सौ वर्षों की आयु दे रहा हूँ पुत्रि पवित्र किये कुल दोऊ- अपने पिता और अपने पति दोनों को सनाथ कर देने वाली सावित्री तुम्हारी जय हो बिना किसी से जुड़े या बंधे हुए और निडर होकर इच्छा को समझकर उससे मुक्त रहने इच्छा जो कि भ्रमों की जननी है उससे मुक्त रहने में आजादी है अकेले रहने में ही असली और अनन्त शक्ति है ज्ञान से ठुंसा हुआ बंधनों में जकड़ा नियोजित दिमाग कभी भी अकेला नहीं होता जो धार्मिक या वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से नियोजित हो वह सदैव सीमित होता है सीमितता ही द्वंद्व का मुख्य घटक है इच्छाओं में जकड़े आदमी के लिये सौन्दर्य एक खतरनाक चीज है पहले अंडा आया या मर्गी? यह प्रश्न हजारों वर्षों से लोगों को परेशान करता आया है लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस यक्ष प्रश्न का जवाब ढूंढ़ निकालने का दावा किया है शेफील्ड और वारविक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक दल ने दावा किया है कि धरती पर अंडे से पहले मुर्गी का जन्म हुआ था वैज्ञानिकों ने पाया कि ओवोक्लाइडिन नाम का प्रोटीन अंडे के खोल के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है उन्होंने बताया कि यह प्रोटीन मुर्गी के अंडाशय से पैदा होता है इसलिये पहले अंडा आया या मुर्गी अब यह पहेली सुलझ गई है वैज्ञानिकों ने कहा कि पहले मुर्गी आई और इसके बाद अंडा पैदा हुआ डेली एक्सप्रेस के मुताबिक रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि प्रोटीन पैदा करने वाली मुर्गियां पहले कैसे आईं इस दल ने अंडे के खोल को देखने के लिये अत्याधुनिक कंप्यूटर हेक्टर का इस्तेमाल किया शोध से जुडे़ प्रमुख वैज्ञानिक डॉण् कोलिन फ्रीमैन ने कहा लम्बे समय से यह संदेह बना हुआ था कि अंडा पहले आया लेकिन अब हमारे पास वैज्ञानिक सबूत है जो हमें बताता है कि मुर्गी पहले आई मुजफ्फरपुर में केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह सम्पन्न नागार्जुन केदार त्रिलोचन शमशेर और मुक्तिबोध हिन्दी में प्रगतिशील काव्य-सृष्टि के पांच रत्न हैं प्रगतिशील साहित्य का आन्दोलन भक्ति आन्दोलन के समान महाप्रतापी मान्य हुआ तो उसमें इन पाँच रत्नों की ऐतिहासिक भूमिका है ये वस्तुतः इतिहास निर्माता कवि हैं इनकी चौथे दशक की कविताएँ ही प्रगतिवाद की आधार-सामग्री थीं इनमें केदारनाथ अग्रवाल रामविलास शर्मा के सखा और कदाचित समकालीनों में सर्वाधिक प्रिय कवि थे केदार साम्राज्यवाद सामन्तवाद पूँजीवाद व्यक्तिवाद और संप्रदायवाद के शत्रु कवि थे 8 मई को बिहार प्रगतिशील लेखक संध द्वारा मुजफ्फरपुर में आयोजित केदारनाथ अग्रवाल की कविता और उसका समय विषयक परिचर्चा में आलेख पाठ करते हुए आलोचक रेवती रमण ने यह बात कही इससे पहले डा. पूनम सिंह ने केदार के काव्य-व्यक्तित्व में मानवीय संवेदनाओ को रेखांकित करते हुए कहा कि केदार की कविता कठिन जीवन-संघर्षों के बीच अदम्य जिजीविषा बनाये रखने वाले स्त्रोतों की खोज करती है वे मूलतः किसानी संवेदना के कवि हैं उनकी कविताएँ उनके बाँदा जनपद की संस्कृति से जुड़ी हुई है नागार्जुन के बाँदा आने पर उन्होंने जो कविता लिखी उसमें उनके गाँव का पूरा चित्र प्रतिबिम्बित है केदार का समस्त कविकर्म अभिजन के दायरे से बाहर जाकर गरीब किसानों कामगार मजदूरों दलित-स्त्रियों के पक्ष में खड़ा है केदार का कवि सामंती वर्चस्व का अतिक्रमण कर मानव मूल्यों की वकालत करता है तथा मुक्तिबोध की तरह अभिव्यक्ति के खतरे उठाने को सदैव तत्पर है बिहार प्रलेस के महसचिव राजेन्द्र राजन ने अपने संबोधन में कहा कि केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशीलता के प्रतिमान हैं उनकी रचनाएँ प्रतिवद्ध साहित्य का नमूना है वे परिवर्तन को अवश्यंभावी मानते थे तभी तो उन्होंने लिखा भी - एक हथौड़े वाला घर में और हुआ / हाथी से बलवान जहाजी हाथों वाला / और हुआ / दादा रहे निहार सवेरा करने वाला /और हुआ / एक हथौड़ा वाला घर में और हुआ बाँदा से आये नरेन्द्र पुण्डरीक ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल की कविता हमारे समाज की विडम्बनाओं एवं त्रासदियें से सीधे साक्षात्कार कराते हुए जिस तरह से अपने परिवेश के उपादानों नदी-पहाड़-खेत पेड़ आदि को एक नयी पहचान देकर उनके प्राकृत सौन्दर्य को अपने यहाँ के आदमी को विसंगतियों से उवारने एवं उसकी पहचान को बनाने एवं उसे सामने लाने का जो कार्य केदार की कविता ने किया है उसकी मिसाल प्रगतिशील हिन्दी कविता में दूसरी नहीं है डा.विजेन्द्रनारायण सिंह ने कहा कि केदार की कविताओं में प्रगतिशीलता प्रयोगवाद और नई कविता का समन्वित प्रवाह है प्रो. तरुण कुमार ने केदार को किसानी संस्कृति और चेतना में हिन्दी का सर्वाधिक प्रतिवद्ध कवि बताया पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव ने कहा कि प्रमाणिक मूल्यों एवं मानवीय संदर्भ के दृष्टिकोण से केदारनाथ अग्रवाल की कविता हमें रास्ता दिखाती है समारोह के उदघाटनकर्त्ता डा. व्रजकुमार पाण्डेय ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल आजादी से लेकर साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए लड़ रही दुनिया के लिए काव्य रचनाएँ की है कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने केदारनाथ अग्रवाल को ग्रामीण संवेदना के साथ ही क्रांतिकारी कवि की संज्ञा दी उन्होंने कहा कि उनकी कविताओ में लड़ाकू मनुष्य दिखायी पड़ता है जो नये समाज के लिए लड़ रहा है इस सत्र का मंच संचालन कवियत्री एवं कथालेखिका पूनम सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन श्रवण कुमार ने किया आयोजन के दूसरे सत्र में कवि-सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें मुजफ्फरपुर सहित बिहार के विभिन्न हिस्सों से आये कवियों की भागीदारी रही नरेन्द्र पुण्डरीक (बाँदा) शहंशाह आलम अरविन्द श्रीवास्तवअरुण शीतांश अली अहमद मंजर श्रीमती मुकुल लाल अरविन्द ठाकुर नूतन आनंद देव आनंद डा. विनय चौधरी रश्मि रेखा आशा अरुण पुष्पा गुप्ता श्वाति सुनिता गुप्ता संजय पंकज मीनाक्षी मीनल श्यामल श्रीवास्तव श्रवण कुमार राजीव कुमार रानी श्रीवास्तव अंजना वर्मा आदि ने अपने काव्य-पाठ से आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया इस सत्र का संचालन युवाकवि रमेश ऋतंभर ने किया तथा अध्यक्षता प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने की मुजफ्फरपुर में आयोजित इस आयोजन की धमक काफी समय तक महसूस की जायेगी हलाला शरिया कानून का हिस्सा नहीं है हलाला शरियत का कानून नहीं है बल्कि इस्लाम के खिलाफ है मैंने अपने लेख में बताया था कि इस्लाम के अनुसार तलाक़ क्या होती है और एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है हाँ अगर किसी महिला की या उसके पति की उससे नहीं बनती और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है क्या हलाला शरिया कानून का हिस्सा है? हलाला शरिया कानून का हिस्सा नहीं है बल्कि तलाक़ को इसलिए सख्त बनाया गया है कि पुरुष महिलाओं पर ज्यादतियां करने की नियत से इसका मज़ाक ना बना लें जब चाहे तलाक़ दिया और फिर जब चाहे दुबारा विवाह कर लिया इसीलिए तलाक़ के बाद वापिस दुबारा शादी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है यहाँ यह भी बताता चलूँ कि इस्लाम में तलाक़ को सबसे ज्यादा नापसंदीदा काम माना गया है और केवल विशेष परिस्थितियों के लिए ही इसका प्रावधान है एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है हाँ अगर किसी तलाकशुदा महिला का अपने पति या उसके पति का उसके साथ तालमेल नहीं बैठता और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो इस्लामिक कानून के मुताबिक उनके लिए बेहद सख्त सज़ाओं का प्रावधान है सन्दर्भ के लिए यह लिंक देखा जा सकता हैं निकाह की हर एक सूरत में महिला और पुरुष दोनों की मर्ज़ी आवश्यक है इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला अथवा पुरुष की मर्ज़ी के शादी हो ही नहीं सकती है अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती हाँ कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं तो इस सूरत में विवाह नहीं होता है और क्योंकि ऐसी स्थिति में क्योंकि विवाह वैध नहीं होता है इसलिए अलग होने के लिए तलाक़ की आवश्यकता भी नहीं होती है उपरोक्त संदर्भो से यह साफ़ हो जाता है कि हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है मैंने एक बार तलाक़ हो जाने पर दुबारा विवाह को लगभग नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला ऐसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी अगर किसी महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विश्वास है तब तो वह ऐसा गुनाह बिलकुल भी नहीं करेंगे और अगर विश्वास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है वह देश के सामान्य कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं न तो चिलचिलाती धूप की चिंता न ही पथरीले रास्ते बन पा रहे रोड़ा मां विंध्यवासिनी के दरबार में आस्था व उत्साह से लबरेज भक्तों का सैलाब कोई इलाहाबाद से तो कोई सुल्तानपुर से चला आया है यहां तक कि दूसरे प्रांतों के लोगों को भी शक्तिदायिनी का प्रताप खींच लाया है रविवार को अवकाश का दिन होने के कारण भक्तों की संख्या पिछले दो दिनों से कहीं ज्यादा थी उनमें भी पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कहीं अधिक देखी गई घंटों कतार में खड़े रहने का किसी को कोई मलाल नहीं बस लाल चुनरिया ओढ़े मइया की मोह लेने वाली एक झलक पाने को हर कोई बेताब कहीं महिलाओं का समूह मां की जय जयकार कर रहा था तो कहीं लोग भजन-कीर्तन में रमे थे सभी को मां के चरणों में सिर झुकाने के लिए अपनी बारी आने का इंतजार था अनुमान लगाया गया कि दिन भर में तकरीबन पांच लाख लोगों ने मां के चरणों में मत्था टेक पुण्य लाभ अर्जित किया उधर त्रिकोण करने वालों की संख्या भी आज अपेक्षाकृत ज्यादा थी मान्यता है कि मां विंध्यवासिनी देवी दर्शन के पश्चात यदि त्रिकोण पर विराजमान काली देवी अष्टभुजा का दर्शन पैदल चलकर किया जाए तो हर मनोकामना पूरी होती है बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने काली व अष्टभुजा का दर्शन कर त्रिकोण परिक्रमा पूरी की इलेक्ट्रॉनिक्स विज्ञान और प्रौद्योगिकी का है कि शाखा है जो इलेक्ट्रॉनों की गति नियंत्रित के विभिन्न मीडिया और वैक्यूम के माध्यम से इस्तेमाल करता है इलेक्ट्रॉन प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता आम तौर पर जानकारी हैंडलिंग या युक्ति नियंत्रण के लिए आवेदन किया है इलेक्ट्रॉनिक्स विद्युत विज्ञान और प्रौद्योगिकी है जो पीढ़ी वितरण नियंत्रण और बिजली के आवेदन के साथ सौदे से अलग है 1950 तक इस क्षेत्र "रेडियो प्रौद्योगिकी"कहा जाता था क्योंकि उसके प्रमुख आवेदन डिजाइन और रेडियो ट्रांसमीटर रिसीवर और वैक्यूम ट्यूबों के सिद्धांत था सबसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आज प्रयोग अर्धचालक घटकों इलेक्ट्रॉन नियंत्रण करने के लिए अर्धचालक युक्तियों और संबंधित प्रौद्योगिकी के अध्ययन भौतिकी की एक शाखा माना जाता है डिजाइन और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का निर्माण जबकि व्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के अंतर्गत आते हैं समस्याओं का समाधान करने के लिए इस लेख इलेक्ट्रॉनिक्स के इंजीनियरिंग पहलुओं पर केंद्रित है दो वर्ष पूर्व तक स्वामी रामदेव जी एक योगी थे और अति आदरनीय जीवन व्यतीत कर रहे थे आम आदमी से लेकर खास आदमी और नेता से लेकर अभिनेता तक उनके प्रशंशक और अनुयायी थे अगर वो चाहते तो इसी तरह जिंदगी गुजार सकते थे जैसा की कुछ अभिनेताओं और नेताओं का कहना है की हर किसी को अपना काम करना चाहिए जो शायद ये भूल गये हैं कि अगर आज़ादी से पहले हर इन्सान यही सोचता तो आज भी हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते क्योंकि गाँधी जी शायद एक वकील सुबाष चंदर बोस एक प्रोफसर और चंदेर्शेखर आजाद किसी संस्कृत विधापीठ में पढ़ा रहे होते किन्तु देश को प्यार करने वाले खुद से ज्यादा देश की फ़िक्र करतें हैं अपनी आन बान और शान देश हित में झोक कर देते हैं वही स्वामी जी ने भी किया आज की स्थिति भी कुछ कुछ वैसी ही है मुठी भर भ्रष्ट और गद्दार नेता देश को नोच नोच कर खा रहें हैं और हर कोई अपना काम कर रहा है वो चाहते भी यही हैं की हर कोई अपना काम करें ताकि कोई उनके काम में बाधा ना बने और उनका काम है देश को लूटना किन्तु जिसके दिल में भारत माता विराजमान हो वो अपनी माँ का इस तरह बलात्कार होते नहीं देख सकता इसी वेदना में स्वामी जी ने देश को वापिस देने की ठानी जो सम्मान उन्हें इस देश से मिला था किन्तु उनसे कुछ गलतियाँ हुई जिनका जिक्र मै अपने अगले ब्लॉग में करूँगा तब उन्होंने देश को भ्रष्टाचार् के प्रति जागरूकता अभियान शुरू किया जहाँ उनके साथ लाखों लोग जुड़ते चले गए उस वक्त हमारी मिडिया टी.आर पी. और अपने आप को दूसरों से बेहतर बताने की होड़ में लगी थी इसीलिए किसी भी नेशनल चैनल पर उन्हें नहीं दिखया गया उसके बाद स्वामी जी ने २७ फ़रवरी को विशाल रैली की जिसमें बड़े बड़े विचारकों ने अपनी राय रखी पर मिडिया के लिए ये सब कोई न्यूज़ नहीं थी अब में आपको आज़ादी से पहले के दौर में लेकर जाता हूँ तब कोई इलेक्ट्रोनिक्स मिडिया नहीं था भारत में आज़ादी के लिए बिगुल बज चूका था महात्मा गाँधी से लेकर सुबाष चंदर बोस और चंदर शेखर आजाद से लेकर भगत सिंह तक हर कोई अंग्रेजो के खिलाफ खड़ा था और भारत के आखरी आदमी तक उनकी चर्चा थी उन सभी के लाखों समर्थक थे तो विरोधी भी थे जिसका कद जितना बड़ा था उतने ही ज्यादा उनके विरोधी भी थे आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला भी चला किन्तु सबका ध्येय एक था आज़ादी और हर आम इन्सान यही चाहता था फिर वो चाहे गाँधी के रास्ते से मिले या भगत सिंह के रास्ते चलकर मिले आज इतिहास में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है और वो लाखों लोगों के हीरो हैं वही दूसरी और आरोप लगाने वालों को कोई नहीं जानता ! अब आज के दौर की बात करते हैं ध्येय सबका एक ही है रास्ता बेशक अलग हो चाहे वो अन्ना हजारे हो यां स्वामी रामदेव जी किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक्स मिडिया ने जो भूमिका निभाई है वो शक के घेरे में है की वो इस अभियान को सफल बनाना चाहते हैं या रोकना चाहते हैं क्या ये उनकी मजबूरी है की उन्हें २४ घंटे न्यूज़ दिखाने के लिए कुछ गैर जिम्मेदार नेताओ से उनकी राय पूछनी पड़ती है जो बेतुके आरोपों कि जड़ी लगा देता है जिसका कोई आधार नहीं होता और उसे ब्रकिंग न्यूज़ बनाकर बार बार दिखाया जाता है ताकि आम लोग जो स्वामी जी बारे में कुछ नहीं जानते वो आरोपों के आधार पर अपनी राय कायम कर सकें कुछ वरिष्ट पत्रकारों से बातचीत करने पर उन्होंने भी माना की कुछ चैनेल अपनी नैतिकता और फ़र्ज़ को भूलकर मुद्दे से आम इन्सान को हटाना चाहते हैं क्या ये माना जाए की उन्हें चैनेल के मालिकों की तरफ से कोई दिशा निर्देश था या सरकारी दबाव में ऐसा कर रहे थे कुछ चैनेल तो स्वामी रामदेव को सिर्फ रामदेव से संबोदित कर रहे थे हमारे भारत वर्ष की भाषा और संस्कर्ती ने हमें सैकंडो सम्मानजनक शब्द दिए हैं हमरे यहाँ किसी आम साधू को भी इस प्रकार संबोदित नहीं किया जाता मेरा मानना है की आज अगर इलेक्ट्रोनिक्स मिडिया ना होता तो ये आन्दोलन ज्यादा सफल होता क्योंकि प्रिंटिंग मिडिया के जरिये हर भारतीय को स्वामी जी के ध्येय का पता चलता और आम जन उनसे जुड़ता चला जाता जहाँ आम जन में यही चर्चा होती कि भारत का कला धन विदेशों में कितना है और सरकार को उसे वापिस लेन में क्या परेशानी है एक तरफ जहाँ स्वामी जी हस्पताल में मौत से जूझ रहे थे वही दूसरी और एक चैनेल कुछ पाखंडी साधुओं के साथ (जो नाम के लिए कीसी भी हद तक गिर जाते हैं) स्वामी जी के योगी होने पर ही सवाल खड़े कर रहे थे जिन्होंने योग का डंका भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में बजाया है आज अगर किसी इन्सान से पूछा जाए कि क्या वो योग के बारे में कैसे जानता है तो उसका जवाब स्वामी रामदेव होगा वो उस व्यक्ति पर दोष लगा कर खुद को ही छोटा दिखा रहे थे क्या चाँद की तरफ मुह करके थूकने से चाँद मैला हो जाएगा ?ये सवाल मै उस डोंगी सी पूछता हूँ जिसे ये भी नहीं पता कि स्वामी जी हँसते कैसे हैं उनकी दिनचर्या क्या है जिसे ये भी नहीं पता की स्वामी जी ने वर्षों से अन्न को त्याग रखा है फिर भी उन्होंने १५ से २० बार प्रेस कांफ्रेंस कि और हर बेतुके सवाल का जवाब देने कि कोशिश क़ी इसी प्रकार किसी ना किसी चैनल पर कोई ना कोई नेता आरोप लगा रहा था और पत्रकार अपने नैतिक मूल्यों क़ी दुहाई दे रहा था ! सवाल ये उठता है की अगर वो निष्पक्ष राय देना ही चाहते हैं तो बहस के लिए दोनों पक्षों को क्यों नही बुलाते जिससे आम जानता को भी सोचने का मौका मिले एक व्यक्ति आरोप लगता है की स्वामी जी के पास करोड़ों की सम्पति है तो उससे ये प्रश्न पूछने वाला कोई नहीं होता की क्या करोड़ों रुपये की आयुर्वेदिक दवाओं का उत्पादन स्वामी जी कमरे में बैठकर करें और ये सम्पति स्वामी जी की नहीं बल्कि एक ट्रस्ट की है जो कई तरह से सेवाएँ दे रही है वो इसका उपयोग अपने परिवार के लिए नहीं करते और अगर ये गलत तरीके से कमाई गई होती तो रात को सोते हुए लोगों पर लाठियां बरसाने वाली सरकार उन्हें यहाँ तक पहुचने देती सच तो ये है की वो अपनी सभी जाँच एजेंसियों से उनकी जाँच करवा चुकी है किन्तु उन्हें मुह की खानी पड़ी तब कुछ नेता लोकतंत्र कि दुहाई देने लगे जिन्हें लोकतंत्र कि परिभाषा तक नहीं मालूम और मिडिया के जरिये लोगों को बरगलाने कि कोशिश करते दिखे उनका कहना था कि हम जानता के चुने हुए नेता हैं क्या इसका मतलब ये हुआ कि जनता ने उन्हें लूटने का अधिकार दे दिया कई वरिष्ट नेताओं का कहना तो यहाँ तक था कि स्वामी जी को कोई हक़ नहीं कि वो काले धन को लाने कि मांग करें क्योंकि वो खुद जनता के चुने हुए सांसद है तो उन्हें ही उस पर फैसला करने का हक है मै उस नेता को चैलेंज करता हूँ कि वो बिना किसी पर्लोभन के एक लाख तो दूर दस हज़ार व्यक्ति इकठे करके दिखा दे जिस लोकतंत्र कि वो दुहाई देते हैं अब जरा उसे समझ लो --- आईआईटी संयुक्त प्रवेश बोर्ड (जेएबी) ने आज यहां एक महत्वपूर्ण बैठक में आईआईटी जेईई परीक्षा का पैटर्न एक और वर्ष समान बनाने रखने पर सहमति जताई. सूत्रों ने कहा कि बोर्ड ने पिछले साल लागू हुए दो चरणों वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नये पैटर्न की विस्तृत समीक्षा की और यह पाया कि इस प्रणाली के करीबी आकलन के लिए इस पैटर्न को एक और वर्ष बनाये रखना चाहिए. जेएबी में इस प्रमुख संस्थान के विभिन्न परिसरों के प्रमुख शामिल हैं. यह बैठक ऐसे समय हुई है जब यह खबरें हैं कि आईआईटी में प्रवेश के लिए योग्यता में कुछ बदलाव किया जा सकता है. जेएबी की आईआईटी खड़गपुर में 15 सितंबर को फिर से बैठक होने की संभावना है जहां इस मुद्दे पर एक बार फिर चर्चा होगी. इस बीच आईआईटी परिषद की बैठक तीन सितंबर को होनी है. माना जा रहा है कि आज की बैठक में अगले साल की परीक्षा की तिथियों पर भी फैसला किया गया. आईआईटी (मुख्य) परीक्षा छह अप्रैल तथा आईआईटी जेईई एडवांस परीक्षा 25 मई को होने की संभावना है. ---- आईआईटी संयुक्त प्रवेश बोर्ड जेएबी ने आज यहां एक महत्वपूर्ण बैठक में आईआईटी जेईई परीक्षा का पैटर्न एक और वर्ष समान बनाने रखने पर सहमति जताई सूत्रों ने कहा कि बोर्ड ने पिछले साल लागू हुए दो चरणों वाली संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नये पैटर्न की विस्तृत समीक्षा की और यह पाया कि इस प्रणाली के करीबी आकलन के लिए इस पैटर्न को एक और वर्ष बनाये रखना चाहिए जेएबी में इस प्रमुख संस्थान के विभिन्न परिसरों के प्रमुख शामिल हैं यह बैठक ऐसे समय हुई है जब यह खबरें हैं कि आईआईटी में प्रवेश के लिए योग्यता में कुछ बदलाव किया जा सकता है जेएबी की आईआईटी खड़गपुर में 15 सितंबर को फिर से बैठक होने की संभावना है जहां इस मुद्दे पर एक बार फिर चर्चा होगी इस बीच आईआईटी परिषद की बैठक तीन सितंबर को होनी है माना जा रहा है कि आज की बैठक में अगले साल की परीक्षा की तिथियों पर भी फैसला किया गया आईआईटी मुख्य परीक्षा छह अप्रैल तथा आईआईटी जेईई एडवांस परीक्षा 25 मई को होने की संभावना है दो वर्ष पूर्व तक स्वामी रामदेव जी एक योगी थे और अति आदरनीय जीवन व्यतीत कर रहे थे आम आदमी से लेकर खास आदमी और नेता से लेकर अभिनेता तक उनके प्रशंशक और अनुयायी थे अगर वो चाहते तो इसी तरह जिंदगी गुजार सकते थे जैसा की कुछ अभिनेताओं और नेताओं का कहना है की हर किसी को अपना काम करना चाहिए जो शायद ये भूल गये हैं कि अगर आज़ादी से पहले हर इन्सान यही सोचता तो आज भी हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते क्योंकि गाँधी जी शायद एक वकील सुबाष चंदर बोस एक प्रोफसर और चंदेर्शेखर आजाद किसी संस्कृत विधापीठ में पढ़ा रहे होते किन्तु देश को प्यार करने वाले खुद से ज्यादा देश की फ़िक्र करतें हैं अपनी आन बान और शान देश हित में झोक कर देते हैं वही स्वामी जी ने भी किया आज की स्थिति भी कुछ कुछ वैसी ही है मुठी भर भ्रष्ट और गद्दार नेता देश को नोच नोच कर खा रहें हैं और हर कोई अपना काम कर रहा है वो चाहते भी यही हैं की हर कोई अपना काम करें ताकि कोई उनके काम में बाधा ना बने और उनका काम है देश को लूटना किन्तु जिसके दिल में भारत माता विराजमान हो वो अपनी माँ का इस तरह बलात्कार होते नहीं देख सकता इसी वेदना में स्वामी जी ने देश को वापिस देने की ठानी जो सम्मान उन्हें इस देश से मिला था किन्तु उनसे कुछ गलतियाँ हुई जिनका जिक्र मै अपने अगले ब्लॉग में करूँगा तब उन्होंने देश को भ्रष्टाचार् के प्रति जागरूकता अभियान शुरू किया जहाँ उनके साथ लाखों लोग जुड़ते चले गए उस वक्त हमारी मिडिया टी.आर पी और अपने आप को दूसरों से बेहतर बताने की होड़ में लगी थी इसीलिए किसी भी नेशनल चैनल पर उन्हें नहीं दिखया गया उसके बाद स्वामी जी ने २७ फ़रवरी को विशाल रैली की जिसमें बड़े बड़े विचारकों ने अपनी राय रखी पर मिडिया के लिए ये सब कोई न्यूज़ नहीं थी --- राग शब्द संस्कृत की धातु रंज से बना है रंज् का अर्थ है रंगना जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है उसी तरह संगीतज्ञ मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता ही तो हैं रंग में रंग जाना मुहावरे का अर्थ ही है कि सब कुछ भुलाकर मगन हो जाना या लीन हो जाना संगीत का भी यही असर होता है जो रचना मनुष्य के मन को आनंद के रंग से रंग दे वही राग कहलाती है हर राग का अपना एक रूप एक व्यक्तित्व होता है जो उसमें लगने वाले स्वरों और लय पर निर्भर करता है किसी राग की जाति इस बात से निर्धारित होती हैं कि उसमें कितने स्वर हैं आरोह का अर्थ है चढना और अवरोह का उतरना संगीत में स्वरों को क्रम उनकी ऊँचाई-निचाई के आधार पर तय किया गया है इसी को आरोह कहते हैं इसके विपरीत ऊपर से नीचे आने को अवरोह कहते हैं आरोह-अवरोह में सातों स्वर होने पर राग सम्पूर्ण जाति का कहलाता है पाँच स्वर लगने पर राग औडव और छह स्वर लगने पर षाडव राग कहलाता है यदि आरोह में सात और अवरोह में पाँच स्वर हैं तो राग सम्पूर्ण औडव कहलाएगा इस तरह कुल 9 जातियाँ तैयार हो सकती हैं जिन्हें राग की उपजातियाँ भी कहते हैं साधारण गणित के हिसाब से देखें तो एक थाट के सात स्वरों में 484 राग तैयार हो सकते हैं लेकिन कुल मिलाकर कोई डे़ढ़ सौ राग ही प्रचलित हैं मामला बहुत पेचीदा लगता है लेकिन यह केवल साधारण गणित की बात है आरोह में 7 और अवरोह में भी 7 स्वर होने पर सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति बनती है जिससे केवल एक ही राग बन सकता है वहीं आरोह में 7 और अवरोग में 6 स्वर होने पर सम्पूर्ण षाडव जाति बनती है